समावेशी जमीनी शासन के वैश्विक मॉडल के रूप में महिला-नेतृत्व वाली पंचायती राज व्यवस्था

पाठ्यक्रम: जीएस-2 / राजव्यवस्था एवं शासन

सन्दर्भ

  • भारत की ब्रिक्स (BRICS) अध्यक्षता 2026 के अंतर्गत पंचायती राज मंत्रालय ने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाने तथा जमीनी स्तर के शासन को सुदृढ़ करने संबंधी भारत की परिवर्तनकारी पहलों को प्रदर्शित किया।

परिचय

  • देशभर में 2.5 लाख से अधिक पंचायतें हैं, जिनमें लगभग 24.04 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि हैं।
  • उल्लेखनीय है कि इनमें लगभग 49.75% प्रतिनिधि महिलाएँ हैं, जो समावेशी स्थानीय शासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है।

पंचायती राज संस्थाएँ (PRIs)

  • बलवंत राय मेहता समिति (1957) ने त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का प्रस्ताव दिया था।
  • राजस्थान वर्ष 1959 में इसे लागू करने वाला पहला राज्य बना।
  • 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।
  • पंचायतों से संबंधित प्रावधान भारतीय संविधान के भाग-IX में दिए गए हैं।
  • पंचायती राज व्यवस्था त्रिस्तरीय संरचना के माध्यम से संचालित होती है—

ग्राम पंचायत (GP):

  • यह ग्राम स्तर पर कार्य करती है तथा मूलभूत नागरिक प्रशासन एवं स्थानीय विकास गतिविधियों के लिए उत्तरदायी होती है।

खंड पंचायत (BP):

  • यह अनेक गाँवों की विकास योजनाओं का समन्वय करती है तथा सरकारी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन को सुनिश्चित करती है।

जिला पंचायत (DP):

  • यह विभिन्न खंडों में विकास गतिविधियों का पर्यवेक्षण एवं समन्वय करती है तथा प्रभावी योजना निर्माण एवं संसाधनों के आवंटन को सुनिश्चित करती है।

ग्राम सभा 

  • किसी गाँव के सभी पंजीकृत मतदाताओं का सामान्य निकाय है और प्रत्यक्ष लोकतंत्र का सबसे सशक्त स्वरूप है।
  • यह पंचायती राज व्यवस्था की एकमात्र स्थायी इकाई है तथा किसी निश्चित अवधि के लिए गठित नहीं की जाती।
  • ग्राम सभा की शक्तियाँ एवं कार्य राज्य विधानमंडल द्वारा कानून के माध्यम से निर्धारित किए जाते हैं।

पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी का महत्व

विविध दृष्टिकोण:

  • महिलाएँ अपने विशिष्ट अनुभव एवं दृष्टिकोण के माध्यम से अधिक व्यापक निर्णय-निर्माण में योगदान देती हैं, जिससे बेहतर समाधान एवं नवाचार को बढ़ावा मिलता है।

प्रेरणास्रोत:

  • नेतृत्व की भूमिकाओं में महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति नई पीढ़ी को प्रेरित करती है तथा लैंगिक रूढ़ियों को चुनौती देती है।

समानता एवं न्याय:

  • उचित प्रतिनिधित्व से लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलता है तथा नीतिनिर्माण एवं प्रशासनिक निर्णयों में महिलाओं की आवश्यकताओं एवं आवाज़ को स्थान मिलता है।

संतुलित नीतियाँ:

  • शासन में महिलाओं की भागीदारी ऐसी नीतियों के निर्माण को प्रोत्साहित करती है, जो विशेष रूप से महिलाओं एवं परिवारों से जुड़े मुद्दों का समाधान करती हैं।

आर्थिक विकास:

  • महिलाओं का सशक्तीकरण एवं प्रतिनिधित्व प्रतिभा के दायरे का विस्तार करता है और समावेशी आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करता है।

सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन:

  • महिलाओं का बढ़ता प्रतिनिधित्व सामाजिक मान्यताओं में सकारात्मक परिवर्तन लाता है तथा समानता आधारित समाज के निर्माण में सहायक होता है।

नेतृत्वकारी पदों पर कार्य करते समय महिलाओं के समक्ष चुनौतियाँ

लैंगिक पूर्वाग्रह:

  • प्रगति के बावजूद अनेक महिलाओं को उनकी क्षमता एवं नेतृत्व कौशल पर संदेह करने वाली रूढ़ियों का सामना करना पड़ता है।

कार्य एवं पारिवारिक जीवन में संतुलन:

  • व्यावसायिक दायित्वों और पारंपरिक पारिवारिक भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाना कठिन होता है, जिससे मानसिक एवं शारीरिक थकान बढ़ सकती है।

उत्पीड़न एवं भेदभाव:

  • कार्यस्थल पर उत्पीड़न एवं भेदभाव आज भी एक गंभीर समस्या है, जो महिलाओं के आत्मविश्वास एवं नेतृत्व क्षमता को प्रभावित करता है।

सामाजिक अपेक्षाएँ:

  • समाज द्वारा पारंपरिक भूमिकाओं के निर्वहन की अपेक्षाएँ महिलाओं की व्यावसायिक आकांक्षाओं के साथ टकराव उत्पन्न करती हैं।

पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के सशक्तीकरण हेतु पहलें

73वाँ एवं 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम:

  • इन संशोधनों के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं तथा शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (1/3) सीटों एवं सभी स्तरों पर अध्यक्ष पदों का आरक्षण अनिवार्य किया गया।
  • महिलाओं के लिए आरक्षित कुल एक-तिहाई सीटों में से 33% सीटें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित की गई हैं।
  • सभी स्तरों पर पदाधिकारियों एवं अध्यक्षों के एक-तिहाई पद भी महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं।

106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम:

  • इसके अंतर्गत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण किया गया है, जिसमें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल हैं।

महिला-अनुकूल आदर्श ग्राम पंचायत (MWFGP):

  • यह स्थानीय शासन में महिलाओं के नेतृत्व को सुदृढ़ करने हेतु एक संस्थागत पहल है।
  • इसका उद्देश्य ऐसी समावेशी एवं लैंगिक-संवेदनशील ग्राम पंचायतों का निर्माण करना है, जो महिलाओं की भागीदारी, सुरक्षा, अधिकार एवं सशक्तीकरण सुनिश्चित करें।

निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों (EWRs) की क्षमता का सुदृढ़ीकरण:

  • इस पहल का उद्देश्य निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के नेतृत्व, संचार एवं निर्णय-निर्माण कौशल को विकसित करना है। इसमें वास्तविक शासन संबंधी परिस्थितियों पर आधारित व्यावहारिक एवं सहभागितापूर्ण प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया गया है।
  • इसी प्रयास के अंतर्गत मंत्रालय ने निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों (WERs) के नेतृत्व, संवाद एवं वार्ता-कौशल को सुदृढ़ करने के लिए एक विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल भी प्रारंभ किया है।

आगे की राह

  • विश्व के सभी देशों में, जहाँ महिलाएँ जनसंख्या का लगभग आधा हिस्सा हैं, उनके उच्च प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना एक सतत आवश्यकता है।
  • महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न्यायपूर्ण, समतामूलक एवं प्रगतिशील समाज के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

स्रोत: PIB

 

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